कोच्चि रिफाइनरी की, कच्चे तेल के आसवन की 2 इकाइयों में (सीडीयू-1 और सीडीयू-2) वर्तमान में कच्चे तेल पर प्रक्रिया की क्षमता 9.5 एमएमटीपीए (लाख टन प्रति वर्ष) है। रिफाइनरी वर्तमान में लगभग 30% स्वदेशी और 70% आयातित कच्चे तेल पर प्रक्रिया करती है। कच्चा तेल, उद्गम स्थल से जहाज़ों में कोच्चि तक आता है। उसे सिंगल पॉइंट मूरिंग (एसपीएम) सुविधा के ज़रिए प्राप्त किया जाता है। कोच्चि एसपीएम, जो पुथुवाइपीन के समुद्री तट से लगभग 20 किमी दूर स्थित है, वह 3.0 लाख टन तक की क्षमता वाले कच्चे तेल से भरे बहुत बड़े क्रूड कैरियर्स (वीएलसीसी) के प्रबंधन के लिए सक्षम है। पुथुवाइपीन में तट से कुछ दूर टैंकों में कच्चे तेल को एसपीएम से प्राप्त किया जाता है और उसके बाद रिफाइनरी के लिए पंप किया जाता है।

कच्चे तेल की आसवन इकाई के अलावा रिफाइनरी की पमुख प्रसंस्करण सुविधाओं में शामिल हैं, फ्लुइडाइज़्ड कैटलिटिक क्रैकिंग (एफसीसी) इकाई, डीज़ल हाइड्रो डिसल्फराइज़ेशन (डीएचडीएस) इकाई, केरोसीन हाइड्रो डिसल्फराइज़ेशन (केएचडीएस) इकाई, सल्फर रिकवरी इकाई (एसआरयू), और एक ऐरोमैटिक ब्लॉक, जो नाप्था स्प्लिटर इकाई (एनएसयू), नाप्था हाइड्रो डिसल्फराइज़ेशन (एनडीएचएस), कैटलिटिक रीफॉर्मर इकाई (सीआरयू) और ऐरोमैटिक्स रिकवरी इकाई (एआरयू) से बना है।

कच्चे तेल को पहले कच्चे तेल के आसवन की इकाई में संसाधित किया जाता है, जहाँ उससे सोडियम और मैग्नेशियम क्षारों, पानी तथा अन्य अवसादों जैसी अशुद्धियों को हटाने के बाद कच्चे तेल के प्रकार के अनुसार उसे करीब 360 से 380oC तक गर्म किया जाता है। इसके बाद कच्चे तेल को डिस्टिलेशन कॉलम में प्रभाजित किया जाता है, जहां LPG, नाप्था, केरोसीन और डीज़ल जैसे हल्के अंशों को अलग किया जाता है। उत्पादों को वातावरण के तापमान तक ठंडा करने के बाद संबंधित संग्रहण स्थान पर भेजा दिया जाता है।

उत्पाद एलपीजी के तौर पर संग्रहित किए जाने से पहले, अशुद्धियाँ हटाने के लिए एलपीजी पर डाई-इथेनॉल अमाइन का उपयोग करके प्रक्रिया की जाती है। नाप्था के एक हिस्से पर ऐरोमैटिक्स ब्लॉक में बेंज़ीन, टोल्युईन और एक विलायक एसबीपीए (स्पेशल बोइलिंग पॉइंट स्पिरिट) बनाने के लिए प्रक्रिया की जाती है। केरोसीन के एक हिस्से पर, एविएशन टर्बाइन फ्यूएल (एटीएफ) और मिनरल टर्पेंटाइन ऑइल (एमटीओ) बनाने के लिए एमईआरओक्स इकाई या केएचडीएस में प्रक्रिया की जाती है। सीडीयू से प्राप्त डीज़ल पर, बी एस II/यूरो-III श्रेणी का डीज़ल बनाने के लिए डीएचडीएस इकाई में प्रक्रिया की जाती है।

कच्चे तेल के शेष बचे भारी हिस्से को, उससे प्रमुख भाग, वैक्यूम गैस ऑइल (वीजीओ) और वैक्यूम रेसीड्यू (वीआर) अलग करने के लिए वैक्यूम डिस्टिलेशन यूनिट (वीडीयू) में फिर से निर्वात में शुद्ध किया जाता है। वीजीओ को एफसीसी इकाई में संसाधित किया जाता है, जहाँ भारी अणुओं को एलपीजी गैसोलीन (जिसे मोटर स्पिरिट या पेट्रोल भी कहते है) और डीज़ल बनाने के लिए तोड़ा जाता है। रिफाइनरी इस समय बी एस II/ और यूरो-III इन दोनों श्रेणियों का पेट्रोल बनाने के लिए सक्षम है।

कंटिन्यूअस कैटलिस्ट रीजनरेशन (सीसीआर) रीफॉर्मर और वीजीओ हाइड्रो डिसल्फराइज़ेशन इकाई (वीजीओ एचडीएस) की शुरूआत के साथ रिफाइनरी, लगभग 70% एमएस (मोटर स्पिरिट) और एचएसडी (हाइ स्पीड डीज़ल) बनाकर यूरो-III के विनिर्देशों को और 30% एमएस और एचएसडी बनाकर यूरो-IV विनिर्देशों को पूर्ण करने में सक्षम बन जाएगी।

वीडीयू से प्राप्त वैक्यूम रेसिड्यू (वीआर) को बिटूमन बनाने के लिए बिटूरॉक्स इकाई में या फर्नेस ऑइल (एफओ) बनाने के लिए विस-ब्रेकर इकाई (वीबीयू) में भेजा जाता है। यदि सीडीयू में संसाधित कच्चा तेल कम सल्फर सामग्री वाला (0.5 डब्ल्यूटी% से कम) हो, तो वीआर को सीधे एलएसएचएस (बॉयलरों, बिजली संयंत्रों, आदि में प्रयुक्त होने वाला लो सल्फर हेवी स्टॉक और फ्यूएल) पूल में भी भेजा जा सकता है। अत्याधुनिक सल्फर रिकवरी यूनिट (एसआरयू) रिफाइनरी में निर्मित गैसों को फ्यूएल गैस के तौर पर इस्तेमाल किए जाने से पहले उसमें से सल्फर निकालती है।

कोच्चि रिफाइनरी अपनी बिजली की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए 22.0 मेगावाट निर्धारित क्षमता वाला एक गैस टर्बाइन (जी.टी), 17.8 मेगावाट का एक स्टीम टर्बाइन जनरेटर (एसटीजी) और 2.5 मेगावाट का एक टर्बो जनरेटर (टीजी) चलाती है। रिफाइनरी की भाप की ज़रूरत को प्रक्रिया इकाइयों में स्थापित छोटे HRSG के अलावा 8 बॉइलरों और 2 वेस्ट हीट बॉइलरों (HRSG) द्वारा पूरा किया जाता है। सीसीआर और वीजीओ एचडीएस इकाइयों और उससे संबंधित स्थापित हो रही अन्य सुविधाओं की अतिरिक्त बिजली की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए 34 मेगावाट का नया जी.टी शुरू किया गया है।

प्रक्रिया इकाइयों और साइट के अन्य क्षेत्रों से प्रवाहित होने वाले तरल से निपटने का काम एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) द्वारा किया जाता है। मिनास (मिनिमम नेशनल स्टैंडर्स) को पूरा करने के बाद उपचरित प्रवाह को नज़दीक की नदियों में छोड़ा जाता है। संसाधन, संग्रहण और उत्पादों को भेजने संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रिफाइनरी में अन्य सेवाओं और परोक्ष सुविधाओं, जैसे टैंकेज, फ्लेयर प्रणाली और पाइपलाइनों को स्थापित किया जा रहा है।